अमिताभ कौशल बार-बार क्यों? संकट सुलझाने की क्षमता या सिस्टम को बचाने की सुविधा?
झारखंड में हर बड़े संकट के बाद एक ही अधिकारी का चेहरा सामने आने लगा है—अमिताभ कौशल. परीक्षा घोटाले से लेकर ट्रेजरी और अन्य विवादों तक उन्हें समिति और सुधार की जिम्मेदारी मिलती रही है. सवाल यह है कि क्या बार-बार समिति बनाना ही समाधान है.

Ranchi: झारखंड सरकार के पास संकट का एक स्थायी चेहरा है—अमिताभ कौशल. परीक्षाएं लुटती हैं तो वे सुधार समिति में बैठते हैं. कोषागार से पैसे निकलते हैं तो वे कागजात मांगते हैं. सड़क पर गोली चलती है तो वे “सभी पहलुओं” की जांच करते हैं. विभाग का सचिव जेल जाता है तो कुर्सी उन्हीं के पास आ जाती है. पहली नजर में यह उनकी क्षमता का प्रमाण हो सकता था. लेकिन बार-बार एक ही संकट में वही चेहरा सामने आए, तो यह क्षमता से ज्यादा एक आदत का प्रमाण लगता है. सरकार जब घबराती है, तो किसी बाहरी आंख की तलाश नहीं करती. वह अपने ही घर के उस अधिकारी को सामने करती है, जो फाइल को विस्फोट बनने से पहले संभाल लेता है. कौशल उस शांत कमरे का नाम बन गए हैं, जहां सड़क का गुस्सा फाइल की सिफारिश में बदल जाता है.
समिति अपराध नहीं काटती, तापमान काटती है
उच्च स्तरीय समिति का काम अक्सर सच को बाहर लाने से ज्यादा संकट का तापमान कम करना बन जाता है. छात्रों को लगे कि सरकार ने कुछ किया. विपक्ष को लगे कि सरकार हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठी. अखबार को एक हेडलाइन मिल जाए. और इस सबके बीच भीतर वही मशीन अपने पुराने ढर्रे पर चलती रहे. कौशल को बार-बार इसलिए चुना जाता है क्योंकि वे इस पूरी प्रक्रिया की भाषा समझते हैं. वे सवाल-जवाब और जवाबदेही की भाषा में नहीं, प्रक्रिया की भाषा में बात करते हैं. प्रक्रिया सरकार के लिए सुरक्षित होती है. पूछताछ खतरनाक होती है. एक अधिकारी को सुधार का जिम्मा देना आसान है. लेकिन उसी तंत्र के शीर्ष लोगों से सवाल करना मुश्किल. समिति बनाना आसान है, जिम्मेदारी की कुर्सी तक पहुंचना मुश्किल.
जो सिस्टम का हिस्सा है, वह सिस्टम को कैसे तोड़े
कौशल बाहर से आए कोई न्यायाधीश नहीं हैं. वे 2001 बैच के उसी कैडर का हिस्सा हैं, जिसकी फाइलें अब सवालों के घेरे में हैं. योजना, खाद्य, कर और उत्पाद—वे सचिवालय के लंबे समय से परिचित चेहरों में हैं. ट्रेजरी घोटाले की समिति उन्हीं के हाथ में है. परीक्षा सुधार की जिम्मेदारी भी उन्हीं के पास है. उत्पाद विभाग भी उन्हीं के दायरे में है, जो हाल में अपने ही सचिव की गिरफ्तारी के बाद खाली हुआ. यानी घाव उन्हीं के विभागों के आसपास हैं और मरहम भी उन्हीं की कुर्सी से निकल रहा है. यह हितों का टकराव कानूनी धारा में बैठे या न बैठे, नैतिक सवाल के स्तर पर बिल्कुल साफ दिखाई देता है. जो अधिकारी कल उसी सिस्टम की फाइलों पर दस्तखत कर रहा था, वही आज उसी प्रशासनिक संस्कृति की जांच का चेहरा कैसे बने? यही वह सवाल है, जिसे समिति की भाषा अक्सर पीछे छोड़ देती है.
रांची वाली समिति याद इसलिए है कि उसके बाद कुछ याद नहीं
2022 की हिंसा समिति इसकी सबसे स्पष्ट मिसाल है. दो मौतें हुईं. सात दिन में रिपोर्ट देने की बात हुई. फिर समय बढ़ा. फिर मामला धुंध में चला गया. पुलिस की एसआईटी चली, सीआईडी आई और परिवार इंतजार करते रहे. समिति ने सरकार को वह दिया, जिसकी उसे जरूरत थी—एक औपचारिक छाता. न्याय नहीं निकला, लेकिन सरकार के पास शांत दिखने का प्रमाण जरूर आ गया. जब कोई समिति सार्वजनिक रूप से किसी बड़ी गर्दन पर जिम्मेदारी तय नहीं करती, तो सरकार उसे दोबारा बुलाने में संकोच नहीं करती. कौशल की पुनरावृत्ति इसी “सफलता” की कीमत है. वे असफल नहीं माने गए. वे उपयोगी माने गए.
सुधार और सजा को जानबूझकर अलग कमरों में बैठाया गया
परीक्षा घोटाले में सरकार ने काम अलग-अलग हिस्सों में बांट दिया. जज पुरानी परीक्षाओं को देखेंगे. पुलिस गिरफ्तारियां करेगी. कौशल आगे का कैलेंडर और एसओपी तैयार करेंगे. यह बंटवारा उतना मासूम नहीं है, जितना दिखाई देता है. सुधार हमेशा भविष्य की ओर देखता है. इसलिए वह अतीत के अधिकारियों तक पहुंचने से बच सकता है. जेएसएससी की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति से सवाल करना सुधार समिति के एजेंडे में नहीं आएगा. एजेंडे में आएगा—बायोमेट्रिक कैसे मजबूत हो, परीक्षा केंद्र कैसे ब्लैकलिस्ट हों, एजेंसी का चयन कैसे बेहतर हो. यानी मशीन चमक जाएगी. लेकिन मशीन चलाने वाले वही रह सकते हैं. छात्रों को नौकरी चाहिए थी और दोषी चाहिए थे. उन्हें समिति दे दी गई.
एक नाम का इतना इस्तेमाल शासन की गरीबी है!
जब झारखंड सरकार के सामने बार-बार कोई बड़ा संकट आता है और हर बार उसी अधिकारी को जिम्मेदारी दे दी जाती है, तो सवाल सिर्फ उस अधिकारी की क्षमता का नहीं रहता. सवाल यह भी उठता है कि आखिर सरकार के पास ऐसी समस्याओं से निपटने के लिए दूसरी मजबूत और स्वतंत्र व्यवस्था क्यों नहीं है. अगर भर्ती परीक्षाओं की निगरानी के लिए आयोग मजबूत होते, घोटालों की जांच के लिए स्वतंत्र और भरोसेमंद व्यवस्था होती और पुलिस-प्रशासन पर लोगों का भरोसा कायम होता, तो हर बड़े विवाद के बाद अमिताभ कौशल को आगे लाने की जरूरत नहीं पड़ती. यही वजह है कि कौशल का बार-बार सामने आना सरकार के लिए सुविधा तो हो सकता है, लेकिन इसे व्यवस्था की मजबूती का प्रमाण नहीं माना जा सकता. क्योंकि किसी अधिकारी पर सरकार को भरोसा होना अलग बात है और उस अधिकारी की जांच व्यवस्था से पूरी तरह स्वतंत्र होना अलग बात.
सरकार के लिए सुविधाजनक अधिकारी वह होता है, जो संकट के बीच प्रक्रिया शुरू करे, रिपोर्ट तैयार करे और मामले को आगे बढ़ाए. इससे सरकार को यह दिखाने में मदद मिलती है कि कार्रवाई हो रही है. लेकिन असली सवाल तब खड़ा होता है, जब रिपोर्ट आने के बाद जिम्मेदारी तय होती है या नहीं. झारखंड को सिर्फ ऐसी व्यवस्था नहीं चाहिए जिसमें हर संकट के बाद समिति बने, रिपोर्ट आए और मामला कुछ समय के लिए शांत हो जाए. जरूरत ऐसी व्यवस्था की है जिसमें जांच के बाद अगर किसी की गलती सामने आती है, तो उसकी जिम्मेदारी भी तय हो.

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