अस्पताल से डिस्चार्ज होते ही राजघाट पहुंचे सोनम वांगचुक, बोले- गांधी का सत्य और अहिंसा का मार्ग आज भी सबसे प्रभावी
“मेदांता अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक अपनी पत्नी गीतांजलि आंग्मो के साथ राजघाट पहुंचे और महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की. उन्होंने देशवासियों से सत्य, अहिंसा और शांतिपूर्ण आंदोलन का रास्ता अपनाने की अपील की.”

Sonam Wangchuk: सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक आज सोमवार को गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल से डिस्चार्ज होने के बाद सीधे अपनी पत्नी गीतांजलि आंग्मो के साथ दिल्ली स्थित राजघाट पहुंचे. यहां उन्होंने महात्मा गांधी को श्रद्धांजलि अर्पित की और देशवासियों से सत्य, अहिंसा और शांति के मार्ग पर चलने की अपील की. हाल ही में 26 दिनों के अनशन के कारण उनकी तबीयत बिगड़ गई थी, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था. स्वस्थ होने के बाद उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सबसे प्रभावी आंदोलन वही होता है, जो गांधीवादी मूल्यों और शांतिपूर्ण तरीके से किया जाए.
राजघाट पहुंचकर महात्मा गांधी को दी श्रद्धांजलि
अस्पताल से छुट्टी मिलने के तुरंत बाद सोनम वांगचुक अपनी पत्नी गीतांजलि आंग्मो के साथ राजघाट पहुंचे. उन्होंने महात्मा गांधी की समाधि पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि गांधी का सत्य और अहिंसा का मार्ग आज भी उतना ही प्रासंगिक है, जितना आज से सौ वर्ष पहले था. उन्होंने कहा कि बदलते समय और परिस्थितियों के बावजूद शांति और संवाद के जरिए समस्याओं का समाधान तलाशना ही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है. वांगचुक ने कहा कि समाज और देश में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए अहिंसा का रास्ता हमेशा प्रभावी रहा है और भविष्य में भी इसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी.
लद्दाख आंदोलन से मिला गांधीवादी संघर्ष का भरोसा
सोनम वांगचुक ने कहा कि पिछले पांच से छह वर्षों से उन्होंने लद्दाख में अपनी मांगों को गांधीवादी तरीके से उठाया और हमेशा सकारात्मक परिणाम देखने को मिले. हालांकि शुरुआत में उन्हें संदेह था कि क्या यही तरीका राष्ट्रीय स्तर पर भी प्रभावी साबित होगा, लेकिन हाल के आंदोलन के दौरान देशभर से मिले समर्थन ने उनका विश्वास और मजबूत कर दिया. उन्होंने कहा कि लोगों का सहयोग यह साबित करता है कि शांतिपूर्ण आंदोलन आज भी जनभावनाओं को जोड़ने और सरकार तक संदेश पहुंचाने का सबसे प्रभावी माध्यम है. उनके अनुसार गांधी के विचार आने वाले कई वर्षों तक समाज को दिशा देते रहेंगे.
'सरकार से ज्यादा जनता के दिल तक पहुंचता है संदेश'
सोनम वांगचुक ने कहा कि अक्सर यह कहा जाता है कि मौजूदा दौर में गांधीवादी आंदोलन प्रभावी नहीं रह गए हैं, लेकिन उनका अनुभव इससे अलग है. उन्होंने कहा कि किसी भी आंदोलन का उद्देश्य केवल सरकार तक पहुंचना नहीं, बल्कि जनता के दिल तक अपनी बात पहुंचाना होता है. जब जनता किसी मुद्दे को समझती और उसका समर्थन करती है, तब हर सरकार उस आवाज को सुनने के लिए मजबूर होती है. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में जनसमर्थन सबसे बड़ी ताकत है और अहिंसक आंदोलन समाज में स्थायी परिवर्तन लाने का माध्यम बन सकते हैं.
देशवासियों से शांति और अहिंसा अपनाने की अपील
राजघाट से सोनम वांगचुक ने देश और दुनिया के लोगों से अपील की कि वे अपनी समस्याओं और मांगों को हिंसा के बजाय शांति, संवाद और लोकतांत्रिक तरीकों से उठाएं. उन्होंने कहा कि अहिंसा के रास्ते पर समाधान मिलने में समय जरूर लग सकता है, लेकिन यह रास्ता अंततः सकारात्मक परिणाम देता है. उन्होंने लोगों से पहली असफलता के बाद निराश न होने की भी अपील की. उनके अनुसार लगातार शांतिपूर्ण प्रयास करने वाले लोगों को अंततः सफलता मिलती है और यही गांधीवादी विचारधारा की सबसे बड़ी ताकत है.
लद्दाख आंदोलन और 26 दिन के अनशन से बनी राष्ट्रीय पहचान
सोनम वांगचुक पिछले कई वर्षों से लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने, पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों के अधिकारों की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं. हाल ही में उनका 26 दिन का अनशन राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना था. अनशन के दौरान उनकी तबीयत बिगड़ने पर उन्हें गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया गया था. अब स्वस्थ होने के बाद उन्होंने राजघाट पहुंचकर एक बार फिर गांधीवादी विचारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में सबसे मजबूत आवाज वही होती है, जो सत्य, अहिंसा और शांतिपूर्ण संघर्ष के साथ उठाई जाती है.


