भाकपा माओवादी के टॉप लीडर प्रशांत बोस उर्फ ‘किशन दा’ का निधन, संगठन को बड़ा झटका
“प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी के वरिष्ठ नेता और पोलित ब्यूरो सदस्य प्रशांत बोस उर्फ ‘किशन दा’ का निधन हो गया है. शुक्रवार सुबह उनकी तबीयत अचानक बिगड़ने के बाद उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. ”

Ranchi: प्रतिबंधित नक्सली संगठन भाकपा माओवादी के वरिष्ठ नेता और पोलित ब्यूरो सदस्य प्रशांत बोस उर्फ ‘किशन दा’ का निधन हो गया है. शुक्रवार सुबह उनकी तबीयत अचानक बिगड़ने के बाद उन्हें इलाज के लिए अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया. उनकी मौत की खबर के बाद सुरक्षा एजेंसियों और प्रशासन में हलचल तेज हो गई है. जानकारी के अनुसार, प्रशांत बोस की तबीयत सुबह करीब चार से छह बजे के बीच बिगड़ी, जब उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी. इसके बाद उन्हें तुरंत इलाज के लिए रांची स्थित राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान (रिम्स) ले जाया गया. डॉक्टरों की टीम ने उनका इलाज शुरू किया, लेकिन सुबह लगभग 10 बजे उन्हें मृत घोषित कर दिया गया. प्रशासन ने मामले को देखते हुए मजिस्ट्रेट की निगरानी में आगे की प्रक्रिया शुरू कर दी है.
75 वर्ष से अधिक आयु के प्रशांत बोस लंबे समय से जेल में बंद थे. उन्हें सरायकेला-खरसावां जिले से 12 नवंबर 2021 को गिरफ्तार किया गया था. उस समय उनके साथ उनकी पत्नी शीला मरांडी भी पकड़ी गई थीं. गिरफ्तारी के समय उन पर एक करोड़ रुपये का इनाम घोषित था, जो संगठन में उनकी अहम भूमिका को दर्शाता है. नक्सली संगठन में प्रशांत बोस की पहचान बेहद प्रभावशाली नेता के रूप में थी. उन्हें संगठन के महासचिव नंबला केशव राव के बाद दूसरा सबसे बड़ा नेता माना जाता था. वे संगठन की केंद्रीय समिति और पोलित ब्यूरो के प्रमुख सदस्य रहे थे और कई रणनीतिक फैसलों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती थी.
‘किशन दा’ के नाम से चर्चित प्रशांत बोस मूल रूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले थे. उन्होंने अपने शुरुआती दौर में माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (MCCI) के साथ काम किया और बाद में इसके प्रमुख भी बने. वर्ष 2004 में MCCI और पीपुल्स वार ग्रुप के विलय के बाद जब भाकपा माओवादी का गठन हुआ, तब उन्हें नए संगठन के पोलित ब्यूरो में शामिल किया गया. लंबे समय तक संगठन में सक्रिय रहने वाले प्रशांत बोस को नक्सली गतिविधियों का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता था. उनकी गिरफ्तारी और अब निधन को सुरक्षा एजेंसियां एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम के रूप में देख रही हैं.
उनकी मौत के बाद प्रशासन ने उनके शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है और पूरे मामले की प्रक्रिया कानूनी निगरानी में की जा रही है. इस घटनाक्रम के बाद एक बार फिर नक्सल गतिविधियों और उनसे जुड़े नेटवर्क पर चर्चा तेज हो गई है. कुल मिलाकर, प्रशांत बोस का निधन नक्सली संगठन के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि वे लंबे समय तक इसकी रणनीतिक और नेतृत्वकारी संरचना का अहम हिस्सा रहे थे.

