I-PAC मामले में सुप्रीम कोर्ट की ममता बनर्जी को फटकार, कहा- लोकतंत्र को खतरे में नहीं डाल सकते
“पश्चिम बंगाल से जुड़े I-PAC और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जांच मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कड़ी टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए. अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी चल रही जांच के दौरान संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा हस्तक्षेप लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए...”

New Delhi: पश्चिम बंगाल से जुड़े I-PAC और प्रवर्तन निदेशालय (ED) जांच मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कड़ी टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए. अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी चल रही जांच के दौरान संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा हस्तक्षेप लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चिंताजनक स्थिति पैदा कर सकता है. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामले को केवल केंद्र बनाम राज्य के राजनीतिक विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसे संस्थागत स्वतंत्रता और जांच एजेंसियों के कामकाज से जुड़े मुद्दे के रूप में समझा जाना चाहिए. सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य की “व्यवहारिक परिस्थितियों” का भी उल्लेख किया और कहा कि न्यायपालिका जमीनी हकीकत से आंखें नहीं मूंद सकती.
जांच में हस्तक्षेप पर अदालत की कड़ी नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी जांच एजेंसी की कार्रवाई के बीच किसी मुख्यमंत्री या वरिष्ठ प्रशासनिक तंत्र का सीधे हस्तक्षेप करना उचित नहीं माना जा सकता. अदालत ने इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर बताते हुए कहा कि जांच की निष्पक्षता और संस्थागत मर्यादा बनाए रखना लोकतंत्र के लिए जरूरी है. पीठ ने कहा कि अदालत केवल सैद्धांतिक दलीलों के आधार पर फैसला नहीं कर सकती, बल्कि उसे राज्य में मौजूद वास्तविक परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना होगा. अदालत की इस टिप्पणी को मामले में सख्त रुख के तौर पर देखा जा रहा है.
न्यायिक अधिकारियों के कथित घेराव पर चिंता
सुनवाई के दौरान न्यायिक अधिकारियों और जांच से जुड़े अधिकारियों के कथित घेराव और दबाव के आरोपों पर भी अदालत ने चिंता जताई. कोर्ट ने इसे “असाधारण स्थिति” करार देते हुए कहा कि इस तरह की घटनाएं न्यायिक प्रक्रिया और प्रशासनिक स्वतंत्रता पर प्रतिकूल असर डाल सकती हैं. अदालत ने कहा कि अगर राज्य में जांच या न्यायिक प्रक्रिया के दौरान अधिकारियों को बाधाओं का सामना करना पड़ रहा है, तो यह बेहद गंभीर मामला है और इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती.
राजनीतिक विवाद से अलग संस्थागत मुद्दा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस मामले को केवल राजनीतिक टकराव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. अदालत ने कहा कि यहां सवाल किसी राजनीतिक दल या सरकार का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और संवैधानिक मर्यादा का है. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत की टिप्पणियां आने वाले दिनों में इस मामले की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकती हैं.
अगली सुनवाई पर टिकी नजरें
मामले की अगली सुनवाई गुरुवार के लिए निर्धारित की गई है. अब सबकी नजरें इस बात पर टिकी हैं कि राज्य सरकार की ओर से क्या जवाब दिया जाता है और अदालत आगे क्या निर्देश जारी करती है. यह मामला पश्चिम बंगाल के चुनावी माहौल के बीच और भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.




