12 साल में दूसरा इस्तीफा... धर्मेंद्र प्रधान के जाने को बीजेपी की सबसे बड़ी हार क्यों बताया जा रहा है?
“धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं, बल्कि 36 दिनों तक चले छात्र आंदोलन, NEET विवाद और बदलते राजनीतिक समीकरणों की कहानी भी है. आखिर इस फैसले को इतना अहम क्यों माना जा रहा है, पढ़िए यह इनसाइटफुल रिपोर्ट.”

26 जुलाई 2026, दोपहर 2:18 बजे। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अपना इस्तीफा भेज दिया. कुछ ही मिनटों में यह खबर सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक छा गई. वजह सिर्फ एक मंत्री का पद छोड़ना नहीं थी, बल्कि उसके पीछे बीते 36 दिनों का छात्र आंदोलन, लगातार बढ़ता जनदबाव और बदलता राजनीतिक माहौल था. प्रधान ने अपने इस्तीफे की जानकारी X पर साझा करते हुए लिखा कि NEET-UG परीक्षा से जुड़ी घटनाओं ने उन्हें गहरी पीड़ा दी है. उन्होंने कहा कि 3 मई को परीक्षा में अनियमितताएं सामने आने के बाद सरकार ने तुरंत CBI जांच कराई, परीक्षा रद्द की, दोबारा परीक्षा आयोजित की और अगले साल से NEET को CBT मोड में कराने का फैसला लिया. इसके बावजूद पिछले कुछ दिनों से बने हालात और छात्रों के भविष्य को देखते हुए उन्होंने पद छोड़ने का निर्णय लिया. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक इस्तीफा है, या इससे कहीं बड़ी राजनीतिक कहानी?
जंतर-मंतर से शुरू हुई मांग... PMO तक कैसे पहुंची?
20 जून को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन शुरू किया। शुरुआती मांग सिर्फ एक थी - धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा. इसके बाद 'संसद चलो' मार्च हुआ. प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई, लाठीचार्ज और आंसू गैस के आरोपों ने आंदोलन को और बड़ा बना दिया. जो विरोध पहले सिर्फ NEET परीक्षा तक सीमित था, वह धीरे-धीरे सरकारी जवाबदेही और परीक्षा व्यवस्था पर राष्ट्रीय बहस बन गया. 24 जुलाई को सरकार और CJP के बीच कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में बातचीत हुई. संगठन ने साफ कहा कि इस्तीफे की मांग पर कोई समझौता नहीं होगा। सरकार ने 25 जुलाई तक का समय मांगा. अगले ही दिन शिक्षा मंत्री का इस्तीफा सामने आ गया. यहीं से इस घटनाक्रम ने राजनीतिक महत्व हासिल कर लिया.
इस इस्तीफे की चर्चा सिर्फ शिक्षा मंत्रालय तक सीमित क्यों नहीं है?
2014 के बाद मोदी सरकार ने अक्सर यह संदेश दिया कि वह राजनीतिक दबाव में फैसले नहीं बदलती. किसान आंदोलन, CAA-NRC विरोध, कोविड प्रबंधन या अन्य बड़े आंदोलनों के दौरान सरकार ने अपनी राजनीतिक लाइन बनाए रखी. इसी वजह से राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को सामान्य प्रशासनिक बदलाव से ज्यादा महत्वपूर्ण मान रहा है. उनका तर्क है कि लंबे छात्र आंदोलन के बीच किसी वरिष्ठ मंत्री का पद छोड़ना अपने आप में एक बड़ा राजनीतिक संकेत है. हालांकि सरकार ने आधिकारिक तौर पर इस्तीफे को आंदोलन के दबाव से जोड़कर कोई टिप्पणी नहीं की है.
क्या इस आंदोलन ने राजनीति की नई भाषा लिखी?
इस आंदोलन की सबसे बड़ी खासियत इसकी डिजिटल मौजूदगी रही. सड़क पर जितने प्रदर्शन हुए, उससे कहीं ज्यादा बहस सोशल मीडिया पर दिखाई दी. मीम्स, वीडियो, लाइव स्ट्रीम और लगातार ऑनलाइन कैंपेन ने आंदोलन को देशभर में चर्चा का विषय बनाए रखा. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि आने वाले समय में इस आंदोलन को इस उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है कि डिजिटल दौर में छात्र किस तरह राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में अपनी जगह बना सकते हैं. इसी बीच RSS प्रमुख मोहन भागवत के उस बयान की भी चर्चा हुई, जिसमें उन्होंने कहा था कि नई पीढ़ी आदेश नहीं, संवाद चाहती है. हालांकि उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान या आंदोलन का सीधा जिक्र नहीं किया था, लेकिन कई राजनीतिक विश्लेषकों ने इसे उस समय के घटनाक्रम के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना.
क्या कहानी यहीं खत्म हो गई?
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा आंदोलन का सबसे बड़ा पड़ाव जरूर है, लेकिन CJP ने साफ कर दिया है कि यह अंत नहीं है. संगठन ने 26 जुलाई की शाम देशव्यापी कैंडल मार्च का ऐलान किया है. उसका कहना है कि 20 जुलाई के प्रदर्शन के दौरान घायल हुए लोगों को मुआवजा और दर्ज 13 FIR वापस लेने तक आंदोलन जारी रहेगा. यानी शिक्षा मंत्री का इस्तीफा इस कहानी का आखिरी अध्याय नहीं, बल्कि शायद एक नए अध्याय की शुरुआत है. अब नजर इस बात पर होगी कि सरकार बाकी मांगों पर क्या फैसला लेती है और क्या यह आंदोलन आने वाले समय में छात्र राजनीति, परीक्षा सुधार और केंद्र सरकार की राजनीतिक रणनीति - तीनों को नई दिशा देगा.



