नेपाल का सैलाब भारत के लिए बड़ा अलर्ट, हिमालय की 200 ग्लेशियल झीलें बनीं खतरे की घंटी
नेपाल में ग्लेशियर टूटने से आई विनाशकारी बाढ़ ने भारत के लिए हिमालयी ग्लेशियल झीलों के खतरे की घंटी बजा दी है. भारत में करीब 7,500 ग्लेशियल झीलें हैं, जिनमें लगभग 200 हाई-रिस्क मानी जाती हैं.


नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को ग्लेशियर टूटने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने सिर्फ नेपाल को नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र को बड़े खतरे का संकेत दिया है. नेपाल में अब तक 626 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि 2,426 लोग लापता हैं. चीन के तिब्बत क्षेत्र में भी कम से कम 7 मौतें और 554 लोग लापता बताए गए हैं. राहत और बचाव अभियान के बीच सबसे बड़ी चिंता उस नई झील को लेकर है, जो ग्लेशियर, बर्फ, चट्टान और मलबे के खिसकने के बाद बनी है. एक झील का पानी घटा है, लेकिन दूसरी अब भी खतरा पैदा कर रही है. यही स्थिति भारत के लिए भी चेतावनी है. भारतीय हिमालय में करीब 7,500 ग्लेशियल झीलें दर्ज हैं, जिनमें लगभग 195-200 को उच्च जोखिम वाली माना गया है.
नेपाल में तबाही के बाद भी खतरा खत्म नहीं
नेपाल में बाढ़ के चौथे दिन भी राहत और बचाव अभियान जारी है. खराब मौसम के कारण हेलीकॉप्टर ऑपरेशन प्रभावित हुए, जबकि जमीन पर सेना, पुलिस और बचाव दल मलबे में फंसे लोगों की तलाश कर रहे हैं. रासुवा के अपर त्रिशूली-1 हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग में 100 से ज्यादा लोगों के फंसे होने की आशंका है. नेपाल में अब तक 3,700 से ज्यादा लोगों को बचाया जा चुका है. आपदा की शुरुआत ग्लेशियर के बड़े हिस्से के टूटने से हुई. करीब 5,200 मीटर की ऊंचाई से बर्फ और चट्टान नीचे गिरी, जिसने नदी में भारी मात्रा में मलबा डाल दिया. इसके बाद बाढ़ का पानी और मलबा तेजी से नीचे आया. त्रिशूली नदी का जलस्तर महज 30 मिनट में करीब 9 मीटर तक बढ़ गया.
नई झील से दूसरी बाढ़ का डर, सैटेलाइट से निगरानी
सबसे गंभीर खतरा अब उस नई झील से है जो ग्लेशियर ढहने के बाद बनी है. नेपाल और चीन दोनों इसकी निगरानी कर रहे हैं. रॉयटर्स के मुताबिक दो झीलों की पहचान हुई है. इनमें से एक में पानी घटने लगा है, लेकिन दूसरी बड़ी झील में अभी भी पानी जमा हो रहा था और उसका स्पष्ट निकास दिखाई नहीं दे रहा था. अगर प्राकृतिक मलबे से बना बांध कमजोर पड़ा और झील अचानक टूट गई, तो दूसरी फ्लैश फ्लड आ सकती है. विशेषज्ञों के मुताबिक ऐसी झीलों में जमा पानी के साथ बर्फ, चट्टान और मलबा नीचे आता है, जिससे सामान्य बाढ़ की तुलना में कहीं ज्यादा विनाशकारी लहर बन सकती है. फिलहाल सैटेलाइट इमेजरी से निगरानी की जा रही है और संभावित जोखिम वाले इलाकों में अलर्ट रखा गया है.
195 झीलें हाई-रिस्क सूची में
नेपाल की घटना ने भारत की तैयारी पर भी सवाल खड़े किए हैं. सरकारी आकलन के मुताबिक भारतीय हिमालय में 7,500 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें मैप की जा चुकी हैं. इनमें से करीब 195 झीलों को हाई-रिस्क सूची में रखा गया है. टाइम्स ऑफ इंडिया की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक करीब 200 झीलों पर जोखिम कम करने के लिए काम चल रहा है और सिक्किम की 25 झीलें सबसे ज्यादा संवेदनशील मानी गई हैं. गंगा बेसिन में ही 4,700 से ज्यादा ग्लेशियल झीलें दर्ज हैं. ISRO के सैटेलाइट अध्ययन ने भी खतरे की तस्वीर साफ की है. 2016-17 में 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 ग्लेशियल झीलों के अध्ययन में पाया गया कि 676 झीलों का विस्तार 1984 के बाद हुआ. इनमें 601 झीलें दोगुने से ज्यादा आकार की हो चुकी थीं. यानी खतरा सिर्फ झीलों की संख्या का नहीं, बल्कि उनके लगातार फैलने का भी है.
नेपाल से बिहार-यूपी तक खतरा, भारत की तैयारी कितनी?
नेपाल की बाढ़ का असर भारत तक पहुंचने की आशंका को देखते हुए केंद्र पहले ही बिहार और उत्तर प्रदेश को अलर्ट कर चुका है. गृह मंत्रालय के मुताबिक नेपाल में अचानक आई बाढ़ के बाद त्रिशूली नदी में तेज बढ़ोतरी दर्ज हुई और इसका पानी आगे गंडक नदी तंत्र में असर डाल सकता है. दोनों राज्यों में स्थानीय प्रशासन और NDRF को सतर्क रखा गया था. भारत ने GLOF जोखिम के लिए 150 करोड़ रुपये के राष्ट्रीय कार्यक्रम के तहत संवेदनशील झीलों को शुरुआती चेतावनी प्रणाली से जोड़ने की योजना बनाई है. ISRO और अन्य एजेंसियां सैटेलाइट निगरानी, मॉडलिंग और जोखिम आकलन पर काम कर रही हैं. जुलाई 2026 में सिक्किम को स्वदेशी ग्लेशियल-लेक मॉनिटरिंग तकनीक भी सौंपी गई.
लेकिन चुनौती सिर्फ झील टूटने की नहीं है. ग्लेशियर का पीछे हटना, बर्फ और चट्टानों का गिरना, भूस्खलन, अचानक बनी झीलें, तेज बारिश, बादल फटना और हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट व आबादी का नदी घाटियों में होना खतरे को कई गुना बढ़ाते हैं. 2023 में सिक्किम की साउथ ल्होनक झील की घटना इसका बड़ा उदाहरण है, जब करीब 14.7 मिलियन क्यूबिक मीटर बर्फ और चट्टान झील में गिरे और करीब 20 मीटर ऊंची विनाशकारी लहर बनी. नेपाल की त्रासदी इसलिए भारत के लिए सिर्फ पड़ोसी देश की आपदा नहीं है. यह संकेत है कि हिमालय में सैटेलाइट मैपिंग से आगे बढ़कर रियल-टाइम निगरानी, स्थानीय चेतावनी, सुरक्षित निकासी मार्ग और नदी घाटियों में निर्माण की समीक्षा अब टालने का विषय नहीं रह गया है.

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