कुर्सी विधायक की, लहजा सड़कछाप! गाली-गलौज, धमकी और दबंगई… झारखंड के ‘माननीयों’ की ये कैसी राजनीति?
झारखंड की राजनीति में जयराम महतो और निर्मल महतो उर्फ तिवारी महतो के कथित गाली-गलौज और आक्रामक तेवरों ने विधायकों की भाषा और पद की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए हैं. क्या ‘माननीय’ की कुर्सी पर बैठकर गाली, धमकी और दबंगई राजनीति का नया अंदाज बन रहा है?


झारखंड की राजनीति में इन दिनों दो विधायक अपने काम से ज्यादा अपनी भाषा और तेवर के कारण चर्चा में हैं—डुमरी के जयराम महतो और मांडू के निर्मल महतो उर्फ तिवारी महतो. दोनों जनता के वोट से विधानसभा पहुंचे हैं. दोनों को सदन में ‘माननीय’ कहा जाता है. लेकिन इनके नाम के साथ इन दिनों जो शब्द सबसे तेजी से घूम रहा है, वह है—गाली. एक पर थानेदार को फोन पर गाली देने और धमकाने का आरोप है, दूसरे के कथित गाली-गलौज वाले वीडियो वायरल हो चुके हैं. सवाल सिर्फ यह नहीं कि किसने किसे क्या कहा. असली सवाल यह है कि विधायक की कुर्सी पर बैठकर भाषा इतनी नीचे क्यों उतर रही है? विधायक कानून बनाता है, कानून की धज्जियां उड़ाने वाला दबंग नहीं बनता. फिर जब जनप्रतिनिधि का लहजा सड़क के दादा जैसा सुनाई देने लगे, तो सवाल उठेगा ही—ये माननीय हैं या सिर्फ माननीय कहलाने वाले दबंग?
विधायक की कुर्सी बड़ी है, आवाज नहीं
विधायक बनने के बाद किसी व्यक्ति की ताकत बढ़ती है, लेकिन उसके शब्दों की जिम्मेदारी भी उतनी ही बढ़ती है. जनता उसे अपनी आवाज बनाकर विधानसभा भेजती है. उससे उम्मीद होती है कि वह पुलिस से सवाल करेगा, अधिकारी से जवाब मांगेगा, सरकार को घेरगा और जनता के हक की लड़ाई लड़ेगा. लेकिन सवाल पूछने और धमकाने में फर्क है. विरोध करने और गाली देने में फर्क है. सख्त तेवर और सड़कछाप भाषा में भी फर्क है. यही फर्क जब मिटने लगे तो समस्या सिर्फ एक विधायक की नहीं रहती. वह राजनीति की संस्कृति का सवाल बन जाती है.
जयराम महतो: सवाल से चिढ़, थानेदार से टकराव
जयराम महतो का ताजा विवाद बरवाअड्डा थाने से जुड़ा है. थाना प्रभारी रवि कुमार की शिकायत पर दर्ज FIR में आरोप है कि 22 अगस्त की रात फोन पर बातचीत के दौरान विधायक ने गाली-गलौज की और वर्दी उतरवाने तथा सरकार बदलने के बाद देख लेने जैसी धमकी दी. कथित ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, लेकिन उसकी स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है. मामला यहीं नहीं रुका. पुलिस संगठनों में नाराजगी सामने आई और विधायक की सदस्यता तक खत्म करने की मांग उठी. अब इस मामले की जांच होगी. दोनों पक्षों के आरोप सामने आए हैं. जयराम महतो ने भी खुद पर हमला किए जाने का आरोप लगाया है. लेकिन जांच से अलग एक सवाल अभी भी खड़ा है—क्या विधायक को अपनी बात रखने के लिए गाली और धमकी का सहारा लेना चाहिए? और जयराम महतो के मामले में यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि मीडिया के साथ उनके तीखे व्यवहार को लेकर पहले भी विवाद सामने आ चुके हैं. मनमाफिक सवाल न हो तो तेवर बदलने की शिकायतें होती रही हैं. पत्रकार का काम सवाल पूछना है, विधायक का काम जवाब देना. सवाल पसंद नहीं आया तो जवाब बदलिए, सवाल पूछने वाले पर गुस्सा नहीं.
तिवारी महतो: विवाद खत्म नहीं होता, वीडियो फिर आ जाता है
मांडू विधायक निर्मल महतो उर्फ तिवारी महतो की कहानी भी बहुत अलग नहीं दिखती. अप्रैल 2026 में जमीन विवाद से जुड़ा एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें ग्रामीणों के साथ बहस के दौरान उनके कथित तौर पर अभद्र भाषा इस्तेमाल करने की चर्चा हुई. वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है. इससे पहले 2025 में जयराम महतो को लेकर कथित अभद्र टिप्पणी का मामला भी सामने आया था. उस समय आजसू की ओर से वीडियो को AI-generated और फर्जी बताया गया था. यानी हर वायरल वीडियो को सच मान लेना भी पत्रकारिता नहीं है. लेकिन सवाल यह है कि ऐसे विवाद बार-बार पैदा क्यों होते हैं?जनप्रतिनिधि के लिए यह सिर्फ कानूनी नहीं, नैतिक सवाल भी है.
दोनों अलग दलों में, लेकिन भाषा का ट्रैक एक
जयराम महतो जेएलकेएम से हैं, तिवारी महतो आजसू से. राजनीतिक विचार अलग हैं, संगठन अलग हैं, इलाका अलग है. लेकिन विवादों का पैटर्न चौंकाता है—आक्रामक भाषा, सार्वजनिक टकराव, वायरल वीडियो और फिर सफाई. यही वह जगह है जहां राजनीति को आईना देखने की जरूरत है. नेता का गुस्सा समर्थकों को ‘टाइगर वाला तेवर’ लग सकता है. कैमरे पर गरजना कुछ लोगों को ताकत दिखा सकता है. लेकिन लोकतंत्र में ताकत का मतलब यह नहीं कि सामने वाला डर जाए. असली ताकत यह है कि सामने वाला असहमत होकर भी आपकी बात सुने.
गाली से डर पैदा हो सकता है, सम्मान नहीं
दबंगई और जनप्रतिनिधित्व के बीच सिर्फ एक कदम का फासला विधायक पुलिस से सवाल कर सकता है. अधिकारी को कटघरे में खड़ा कर सकता है. सरकार को घेर सकता है. पत्रकार के सवाल का जवाब भी तीखे अंदाज में दे सकता है. लेकिन गाली और धमकी उस पूरी राजनीतिक ताकत को कमजोर कर देती है. क्योंकि जिस व्यक्ति से जनता कानून बनाने की उम्मीद करती है, अगर वही कानून लागू करने वाले पुलिसकर्मी को धमकाने के आरोप में घिर जाए, तो सवाल सिर्फ व्यक्ति पर नहीं उठता—पूरी संस्था की गरिमा पर उठता है. और अगर ग्रामीण के साथ कथित अभद्रता कैमरे में कैद होती है, तो वह सिर्फ एक बहस नहीं रहती. वह जनप्रतिनिधि के चरित्र और राजनीतिक संस्कार का सवाल बन जाती है.
पार्टियां चुप क्यों हैं, जनता कब सवाल करेगी?
सबसे बड़ा सवाल दोनों विधायकों से ज्यादा उनकी पार्टियों से है. क्या टिकट मिल जाने के बाद पार्टी की जिम्मेदारी खत्म हो जाती है? क्या चुनाव जीतने के बाद विधायक को अपने व्यवहार का हिसाब नहीं देना चाहिए? और सवाल जनता से भी है. हम नेता का तेज तेवर देखकर खुश क्यों होते हैं? गाली को ‘दबंगई’ और धमकी को ‘टाइगर वाला अंदाज’ क्यों कहते हैं? अगर यही भाषा किसी आम आदमी की हो तो हम उसे बदतमीज कहते हैं. वही भाषा विधायक की हो जाए तो उसे ‘आक्रामक नेता’ क्यों कहा जाए?
लोकतंत्र में जनता का प्रतिनिधि जनता से ऊपर नहीं होता.
‘माननीय’ कोई ताज नहीं है. यह जिम्मेदारी है. विधानसभा की कुर्सी किसी को कानून से बड़ा नहीं बनाती. बल्कि कानून बनाने की जिम्मेदारी उसे और ज्यादा जवाबदेह बनाती है. जयराम महतो हों या तिवारी महतो—दोनों के समर्थक अपने-अपने नेता का बचाव कर सकते हैं. पार्टियां अपने तर्क दे सकती हैं. वायरल वीडियो की सच्चाई जांच का विषय हो सकती है. लेकिन एक बात पर बहस नहीं होनी चाहिए—गाली राजनीतिक ताकत नहीं है और धमकी जनप्रतिनिधित्व की भाषा नहीं. झारखंड को ऐसे विधायक चाहिए जिनकी आवाज विधानसभा में ऊंची हो, शब्दों का स्तर नहीं गिरे. क्योंकि जनता ने उन्हें अपना प्रतिनिधि बनाया है, इलाके का ‘दादा’ नहीं. और आखिर में सवाल वही है, मगर इस बार थोड़ा ज्यादा कड़वा—विधायक की पहचान उसके पद से होगी या उसके व्यवहार से?

specializes in local and regional stories, bringing simple, factual, and timely updates to readers.




Leave a comment