VIDEO: गजलीटांड़ हादसा: एक रात, कई चेतावनियां और 64 मौतें, मजदूरों को मौत से पहले क्या-क्या संकेत मिल चुके थे?
“25 सितंबर 1995 की रात धनबाद के गजलीटांड़ खदान हादसे में भारी बारिश के बाद कतरी नदी का तटबंध टूटने से खदान में पानी घुस गया और 64 मजदूरों की मौत हो गई. हादसे से पहले बिजली, वेंटिलेशन और वाइंडिंग सिस्टम प्रभावित हो चुके थे, जबकि मजदूरों ने बाहर निकालने के संकेत भी दिए थे.”

Dhanbad: झारखंड में 25 सितंबर 2026 को एक बार फिर बारिश हो रही है. धनबाद में भी लगातार बारिश के बीच कई इलाकों में पानी जमा है. लेकिन आज से 31 साल पहले यही बारिश धनबाद के गजलीटांड़ में एक ऐसी त्रासदी लेकर आई थी, जिसने कोयला खनन के इतिहास को हिला दिया. 25 सितंबर 1995 की रात करीब 330 मिलीमीटर बारिश हुई. कतरी नदी का जलस्तर बढ़ा और रात करीब 12:45 बजे नदी का सुरक्षा तटबंध टूट गया. करीब एक किलोमीटर दूर स्थित गजलीटांड़ की खदान में पानी घुस गया. उस वक्त छह नंबर पिट में मजदूर मौजूद थे. बिजली पहले ही जा चुकी थी, वाइंडिंग सिस्टम बंद था और नीचे फंसे मजदूर बाहर निकलने के लिए संकेत दे रहे थे. अगले कुछ घंटों में 64 मजदूरों की जान चली गई. हादसे के बाद जांच, पुलिस केस और अदालत की कार्यवाही हुई, लेकिन तीन दशक बाद भी सबसे बड़ा सवाल कायम है—क्या यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा थी या सुरक्षा व्यवस्था की चूक ने मौत का रास्ता आसान कर दिया?
25 सितंबर की रात: बारिश, नदी और टूटता तटबंध
25 सितंबर 1995 की शाम से धनबाद में बारिश तेज होती जा रही थी. कुछ ही घंटों में करीब 330 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई. लगातार बारिश के कारण कतरी नदी उफान पर थी और नदी के किनारे बने मिट्टी के सुरक्षा तटबंध पर पानी का दबाव बढ़ता जा रहा था. गजलीटांड़ की पिट नदी से करीब एक किलोमीटर की दूरी पर थी. सामान्य परिस्थितियों में यह दूरी खदान को सीधे खतरे से बचाने के लिए काफी मानी जा सकती थी, लेकिन उस रात तटबंध टूटने के बाद यही दूरी बेअसर साबित हुई. रात करीब 12:45 बजे तटबंध टूट गया. नदी का पानी उस दिशा में बहने लगा, जहां जमीन के नीचे मजदूर काम कर रहे थे. हालांकि खदान के भीतर संकट इससे पहले ही गहराने लगा था. रात करीब 9:15 बजे बिजली चली गई थी. बिजली जाने से इलेक्ट्रिक मशीनें बंद हो गईं और मेन मैकेनिकल वेंटिलेटर भी काम करना बंद कर गया. इसके बाद मजदूरों को ऊपर लाने वाली व्यवस्था भी संकट में पड़ गई. छह नंबर पिट का वाइंडिंग सिस्टम भाप से चलता था. करीब 10:15 बजे के बाद वाइंडिंग इंजन भी बंद हो गया, क्योंकि बॉयलर में पर्याप्त भाप का दबाव नहीं था. यानी जिस वक्त बाहर बारिश और नदी का पानी खतरा बढ़ा रहे थे, उसी समय नीचे से मजदूरों को निकालने की मुख्य व्यवस्था भी कमजोर पड़ चुकी थी.
नीचे मजदूर फंसे थे, ऊपर से निकलने का रास्ता बंद होता गया
खदान के अंदर मौजूद मजदूरों को हालात की गंभीरता का अंदाजा होने लगा था. रात करीब 11 बजे तक मजदूरों ने ऊपर निकालने के लिए संकेत दिए और अलार्म बजाए. कुछ मजदूरों को बाहर निकालने की कोशिश भी हुई. करीब 24 मजदूरों को रात 9:45 से 10 बजे के बीच ऊपर लाया जा सका. लेकिन इसके बाद वाइंडिंग सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया और बाकी मजदूर नीचे ही रह गए. यहीं से हादसे का सबसे महत्वपूर्ण सवाल सामने आता है. जब खदान के अंदर बिजली नहीं थी, वेंटिलेशन प्रभावित था और वाइंडिंग इंजन काम नहीं कर रहा था, तब क्या नीचे मौजूद सभी मजदूरों को तत्काल बाहर निकालने की व्यवस्था की जा सकती थी? बाद की जांच में यही सुरक्षा व्यवस्था महत्वपूर्ण सवालों में शामिल हुई. उधर बाहर नदी का जलस्तर लगातार बढ़ रहा था. रिवर गार्ड से पानी बढ़ने की सूचना मिलने के बाद करीब 12:30 बजे मैनेजर और सेफ्टी ऑफिसर खदान की तरफ पहुंचे. मैनेजर छह नंबर पिट तक गया, लेकिन वहां भी वाइंडर चलाने के लिए पर्याप्त भाप नहीं थी. बॉयलर में दोबारा भाप तैयार करने की कोशिश की गई.
करीब 1:30 बजे छह नंबर पिट की तरफ अचानक ठंडी हवा का तेज झोंका आया. इसके बाद पानी खदान के अंदर पहुंच गया. कुछ ही समय में पानी उन रास्तों और हिस्सों तक फैल गया, जहां मजदूर मौजूद थे. बाहर से बचाव की कोशिश शुरू हुई, लेकिन नीचे मौजूद मजदूरों और बाहर की दुनिया के बीच पानी की एक विशाल दीवार खड़ी हो चुकी थी. इसके बाद बड़े पंपों से पानी निकालने का अभियान शुरू किया गया. पानी की मात्रा इतनी ज्यादा थी कि सामान्य पंप पर्याप्त नहीं थे. बाद में यूक्रेन से 12 हाई-हेड पंप और चीन से 8 हाई-हेड पंप मंगाए गए. लेकिन तब तक हादसा अपनी सबसे भयावह स्थिति में पहुंच चुका था.
26 सितंबर की सुबह: राहत से ज्यादा बड़ा था जवाबदेही का सवाल
26 सितंबर की सुबह तक गजलीटांड़ की खबर देशभर में फैल चुकी थी. छह नंबर पिट में मजदूरों के फंसे होने की सूचना के बाद घटनास्थल पर भीड़ बढ़ने लगी. प्रशासन, पुलिस, बीसीसीएल और डीजीएमएस के अधिकारी मौके पर पहुंचे. तत्कालीन केंद्रीय कोयला मंत्री जगदीश टाइटलर भी घटनास्थल पहुंचे. पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव, जगन्नाथ मिश्रा, तत्कालीन सीएमडी जीसी मृग समेत कई जनप्रतिनिधियों के पहुंचने की बात सामने आती है. पीड़ित परिवारों से मुलाकात हुई. सरकार ने मृत मजदूरों के परिजनों के लिए अतिरिक्त मुआवजे और प्रत्येक परिवार से एक व्यक्ति को नौकरी देने की घोषणा की. लेकिन सरकारी घोषणाओं से उस मूल सवाल का जवाब नहीं मिला कि हादसा हुआ कैसे और क्या इसे रोका जा सकता था?
इसी सवाल के साथ सरकार ने Court of Inquiry गठित की. इसकी अध्यक्षता पटना हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस एस.के. मुखर्जी ने की. उनके साथ तकनीकी और ट्रेड यूनियन पक्ष से एसेसर्स भी रखे गए. जांच के सामने प्राकृतिक आपदा के साथ-साथ खदान की सुरक्षा व्यवस्था का सवाल था. बिजली पहले ही जा चुकी थी. वाइंडिंग सिस्टम काम नहीं कर रहा था. मजदूरों की ओर से अलार्म और संकेत दिए गए थे. कुछ मजदूरों को ऊपर निकालने के बाद बाकी लोगों को समय रहते बाहर नहीं लाया जा सका. पुलिस मामले में यह सवाल भी उठा कि नदी के बढ़ते पानी पर नजर रखने वाला बैंक्समैन पहले ही हटा दिया गया था या नहीं. यानी जांच का दायरा सिर्फ इस बात तक सीमित नहीं रहा कि तटबंध क्यों टूटा. सवाल यह भी बना कि खतरे के संकेत मिलने के बाद खदान प्रबंधन और सुरक्षा तंत्र ने क्या किया.
जांच से अदालत तक: जिम्मेदारी तय करने की कोशिश कितनी दूर पहुंची?
गजलीटांड़ हादसे के बाद मामला पुलिस तक पहुंचा. कतरास थाना कांड संख्या 334/95 दर्ज किया गया. जांच के बाद 15 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई और मामला अदालत तक पहुंचा. इस दौरान हादसे की जिम्मेदारी तय करने को लेकर कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी. 1999 में पटना हाईकोर्ट ने कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ चल रही कार्यवाही से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई की. उपलब्ध साक्ष्यों और कानूनी आधार के आधार पर संबंधित याचिकाकर्ताओं के खिलाफ कार्यवाही निरस्त कर दी गई. लेकिन अदालत में किसी स्तर पर कार्यवाही खत्म होना और हादसे के हर सवाल का सामाजिक या प्रशासनिक स्तर पर जवाब मिल जाना—दो अलग बातें थीं.
Court of Inquiry की कार्यवाही को लेकर भी बाद के वर्षों में अलग-अलग रिकॉर्ड और रिपोर्ट सामने आते रहे. कुछ रिकॉर्ड में जांच रिपोर्ट जमा होने का उल्लेख मिलता है, जबकि बाद की स्थानीय रिपोर्टिंग में इसे अधूरी या बिना अंतिम नतीजे वाली जांच के तौर पर पेश किया गया. यही वजह है कि तीन दशक बाद भी गजलीटांड़ की कहानी में जवाबदेही का प्रश्न पूरी तरह साफ नहीं हो पाया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हादसे से पहले कई घटनाएं क्रमशः सामने आई थीं—भारी बारिश, नदी का बढ़ता जलस्तर, बिजली का जाना, वेंटिलेशन का प्रभावित होना, वाइंडिंग सिस्टम का बंद होना और मजदूरों की ओर से बाहर निकालने के संकेत. इसके बाद तटबंध टूटने से पानी खदान में पहुंचा. इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा मानना उस समय सामने आए सुरक्षा संबंधी सवालों को नजरअंदाज करना होगा. वहीं केवल मानवीय चूक को अंतिम कारण मानना भी बिना पूरी जांच के निष्कर्ष पर पहुंचना होगा. असली सवाल इन्हीं दोनों के बीच है—प्राकृतिक खतरे को कितना पहले पहचाना गया और खतरा सामने आने के बाद उपलब्ध सुरक्षा व्यवस्था ने कितना काम किया?
31 साल बाद भी शहीद स्तंभ पर लौटता है वही सवाल
हर साल 26 सितंबर को गजलीटांड़ के शहीद स्तंभ पर उन 64 मजदूरों को श्रद्धांजलि दी जाती है. मजदूरों के परिवार, बीसीसीएल के अधिकारी, यूनियन के नेता और जनप्रतिनिधि वहां पहुंचते हैं. फूल चढ़ाए जाते हैं, गीता और कुरान का पाठ होता है, सर्वधर्म प्रार्थना की जाती है और दो मिनट का मौन रखा जाता है. समय बीतने के साथ हादसे की तस्वीरें धुंधली जरूर हुई हैं, लेकिन उन परिवारों के लिए 25 सितंबर 1995 की रात आज भी इतिहास का कोई पुराना पन्ना नहीं है. वह उनके जीवन का वह क्षण है, जिसके बाद घर का एक सदस्य कभी वापस नहीं लौटा. गजलीटांड़ हादसे को 31 साल हो चुके हैं. इस दौरान धनबाद के कोयला क्षेत्र में तकनीक बदली, सुरक्षा के तरीके बदले और खनन व्यवस्था में कई बदलाव हुए. लेकिन गजलीटांड़ आज भी एक महत्वपूर्ण सवाल छोड़ता है—जब प्राकृतिक खतरे के संकेत पहले से मौजूद हों, तब किसी खदान में काम कर रहे लोगों की सुरक्षा के लिए आखिरी जिम्मेदारी किसकी होती है?
25 सितंबर की बारिश हर साल लौटती है. कतरी नदी भी बहती है. लेकिन गजलीटांड़ की कहानी सिर्फ उस रात की बारिश की कहानी नहीं है. यह उस पूरे घटनाक्रम की कहानी है जिसमें प्रकृति का खतरा, खदान की सुरक्षा व्यवस्था, चेतावनी के संकेत और बचाव की कोशिशें एक-दूसरे से जुड़ते चले गए. 64 मजदूरों की मौत के तीन दशक बाद भी श्रद्धांजलि हर साल दी जाती है. मगर उस रात की पूरी जवाबदेही का सवाल आज भी उसी जगह खड़ा है—गजलीटांड़ की उस खदान के बाहर, जहां कभी 64 परिवार अपने लोगों के लौटने का इंतजार कर रहे थे.

