supreme court ने Allahabad High Court का विवादित फैसला रद्द किया: पायजामा खोलना माना दुष्कर्म की कोशिश
“सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें नाबालिग लड़की के पायजामा खोलने और उसके साथ अश्लील हरकत करने को दुष्कर्म या दुष्कर्म की कोशिश नहीं माना गया था. ”

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस विवादित फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें नाबालिग लड़की के पायजामा खोलने और उसके साथ अश्लील हरकत करने को दुष्कर्म या दुष्कर्म की कोशिश नहीं माना गया था. पिछले साल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बीआर गवई और एजी मसीह ने स्वतः संज्ञान लेकर इस मामले में रोक लगा दी थी. सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति एनवी अंजारिया के साथ मामले की सुनवाई की और हाईकोर्ट के फैसले को संवेदनहीन और कानून की गलत व्याख्या बताते हुए रद्द कर दिया.
मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले से संबंधित है, जहां नाबालिग लड़की की मां ने शिकायत दर्ज कराई थी. शिकायत में आरोप था कि पवन और आकाश नाम के युवकों ने लड़की के स्तन पकड़े, उसके पायजामे का स्ट्रिंग तोड़ा और उसे पुलिया के नीचे खींचने की कोशिश की. इसके आधार पर विशेष अदालत ने पोक्सो एक्ट की धारा 18 और आईपीसी की धारा 376 के तहत समन जारी किया. बाद में आरोपी इलाहाबाद हाईकोर्ट गए, जिसने अपने आदेश में इसे दुष्कर्म की कोशिश नहीं माना और कहा कि यह केवल “तैयारी” है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि स्तन पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खोलना दुष्कर्म की कोशिश के बराबर है. अदालत ने हाईकोर्ट के फैसले को कानून के स्थापित सिद्धांतों के गलत इस्तेमाल के कारण रद्द कर दिया और विशेष अदालत द्वारा लगाए गए आरोपों को बहाल किया. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में कानूनी तर्क के साथ पीड़िता की सुरक्षा और संवेदनशीलता को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 17 मार्च 2025 के अपने आदेश में कहा था कि सिर्फ ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खींचना दुष्कर्म का अपराध नहीं है, लेकिन यह महिला के कपड़े उतारने या उसे नंगा करने के इरादे से हमला या बल प्रयोग के दायरे में आता है. सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज करते हुए प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंस एक्ट और आईपीसी की धारा 376 के तहत आरोपियों के खिलाफ दुष्कर्म की कोशिश के कड़े चार्ज को बहाल किया. अब दोनों आरोपियों को न्याय के तहत सजा मिलने की संभावना है. यह फैसला यौन अपराधों के मामलों में न्याय की दिशा और पीड़ितों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने वाली महत्वपूर्ण मिसाल माना जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि तकनीकी व्याख्या के बजाय अपराध की गंभीरता और पीड़िता की सुरक्षा को हमेशा प्राथमिकता दी जानी चाहिए.




