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Home»राज्य»प्रयागराज माघ मेला विवाद: शंकराचार्य पद, प्रशासनिक नोटिस और सियासत का टकराव
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प्रयागराज माघ मेला विवाद: शंकराचार्य पद, प्रशासनिक नोटिस और सियासत का टकराव

“प्रयागराज माघ मेला एक बार फिर धार्मिक आस्था, प्रशासनिक अधिकार और कानूनी व्याख्या के टकराव का केंद्र बन गया है. ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य होने का दावा करने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को माघ मेला प्राधिकरण द्वारा नोटिस भेजे जाने के बाद यह विवाद अचानक सुर्खियों में आ गया. ”

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Bawal DeskEditorial Desk
Published Jan 21, 2026 · 12:19 PM· 6 min read
प्रयागराज माघ मेला विवाद: शंकराचार्य पद, प्रशासनिक नोटिस और सियासत का टकराव

प्रयागराज माघ मेला एक बार फिर धार्मिक आस्था, प्रशासनिक अधिकार और कानूनी व्याख्या के टकराव का केंद्र बन गया है. ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य होने का दावा करने वाले स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को माघ मेला प्राधिकरण द्वारा नोटिस भेजे जाने के बाद यह विवाद अचानक सुर्खियों में आ गया. प्रशासन ने नोटिस में सवाल उठाया कि जब मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, तब स्वयं को शंकराचार्य के रूप में प्रस्तुत करने का आधार क्या है. इस नोटिस के जवाब में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से आठ पन्नों का विस्तृत जवाब भेजा गया है, जिसमें नोटिस को न सिर्फ अपमानजनक बताया गया, बल्कि करोड़ों हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ करार दिया गया है. जवाब भेजने की प्रक्रिया, दफ्तर में अफसरों की अनुपस्थिति, संत समाज की प्रतिक्रिया और सियासी बयानबाजी ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है.

माघ मेला प्राधिकरण का नोटिस और उठे सवाल

यह भी पढ़ें:हरीश रावत का कांग्रेस के पदों से इस्तीफा, PA पर ED की कार्रवाई के बाद बोले- पार्टी के संघर्ष में कमजोरी नहीं चाहता

मंगलवार को प्रयागराज माघ मेला प्राधिकरण ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को एक औपचारिक नोटिस जारी किया. नोटिस में कहा गया कि ज्योतिष पीठ से जुड़ा शंकराचार्य पद का मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, ऐसे में स्वयं को शंकराचार्य के रूप में प्रस्तुत करना किस आधार पर किया जा रहा है. प्रशासन का तर्क था कि माघ मेले जैसे सार्वजनिक धार्मिक आयोजन में किसी भी पदवी का उपयोग न्यायिक स्थिति को देखते हुए होना चाहिए. इस नोटिस के सामने आने के बाद संत समाज और अनुयायियों में नाराजगी फैल गई. उनका कहना था कि यह केवल एक व्यक्ति से जुड़ा सवाल नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सनातन परंपरा और धार्मिक पद की गरिमा से जुड़ा विषय है. नोटिस ने प्रशासन और धार्मिक नेतृत्व के बीच तनाव की स्थिति पैदा कर दी.

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नोटिस के जवाब में भेजा गया 8 पन्नों का स्पष्टीकरण

नोटिस मिलने के बाद स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से माघ मेला प्राधिकरण को आठ पन्नों का विस्तृत जवाब भेजा गया. यह जवाब प्राधिकरण की आधिकारिक ईमेल आईडी के साथ-साथ सेक्टर-4 स्थित मेला कार्यालय में भी भेजा गया. जवाब में नोटिस की भाषा और मंशा पर सवाल उठाते हुए इसे अपमानजनक बताया गया. जवाब में कहा गया कि प्रशासनिक हस्तक्षेप से करोड़ों हिंदुओं की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं. यह भी स्पष्ट किया गया कि शंकराचार्य पद कोई प्रशासनिक नियुक्ति नहीं, बल्कि सनातन परंपरा से जुड़ा धार्मिक पद है. इस जवाब के जरिए यह संदेश देने की कोशिश की गई कि धार्मिक मामलों में प्रशासन को बेहद संतुलित और संवेदनशील रवैया अपनाना चाहिए.

दफ्तर में अफसर न मिलने पर गेट पर चस्पा हुआ जवाब

यह भी पढ़ें:JSSC CGL विवाद: 28 सफल अभ्यर्थियों से पूछताछ, कोडरमा के दो संदिग्ध हिरासत में

जब स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की टीम आठ पन्नों का जवाब लेकर मेला प्राधिकरण के कार्यालय पहुंची, तो वहां कोई भी जिम्मेदार अधिकारी मौजूद नहीं था. काफी देर इंतजार के बाद भी जब कोई अधिकारी जवाब लेने नहीं आया, तो अनुयायियों में असंतोष बढ़ गया. अंततः टीम ने वह जवाब कार्यालय के मुख्य द्वार पर ही चस्पा कर दिया. यह दृश्य देखते ही देखते चर्चा का विषय बन गया. समर्थकों का कहना था कि जवाब देने की पूरी कोशिश की गई, लेकिन प्रशासनिक उदासीनता के कारण उन्हें यह कदम उठाना पड़ा. वहीं, प्रशासनिक हलकों में इसे असामान्य स्थिति माना गया. इस घटनाक्रम ने पूरे विवाद को और ज्यादा हाई-प्रोफाइल बना दिया.

सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का हवाला और कानूनी तर्क

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की ओर से भेजे गए जवाब में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का विस्तार से हवाला दिया गया है. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता अंजनी कुमार मिश्रा के माध्यम से भेजे गए जवाब में कहा गया कि प्रशासन 14 अक्टूबर 2022 के आदेश का हवाला दे रहा है, जबकि उससे पहले 21 सितंबर 2022 का आदेश भी मौजूद है. उस आदेश में स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को शंकराचार्य बताया गया था. इसके अलावा, यह भी कहा गया कि पट्टाभिषेक 12 अक्टूबर 2022 को हो चुका था, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 17 अक्टूबर 2022 के बाद नए पट्टाभिषेक पर रोक लगाई थी. इस आधार पर नोटिस को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया गया.

गलत एफिडेविट का आरोप और अवमानना की चेतावनी

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता पीएन मिश्रा ने भी प्रशासन पर गंभीर आरोप लगाए. उन्होंने कहा कि वासुदेवानंद द्वारा गलत एफिडेविट देकर आदेश प्राप्त किया गया था, जिसके खिलाफ याचिका पहले ही दाखिल की जा चुकी है. वकील का कहना है कि प्रशासन ने तथ्यों को पूरी तरह से समझे बिना नोटिस जारी किया, जो सुप्रीम कोर्ट की अवमानना की श्रेणी में आ सकता है. जवाब में यह भी चेतावनी दी गई है कि जिन अधिकारियों ने भ्रम फैलाने वाला नोटिस जारी किया है, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है. इस बयान के बाद विवाद का कानूनी पक्ष और अधिक मजबूत होता दिख रहा है.

राजनीतिक बयानबाजी और अखिलेश यादव की प्रतिक्रिया

शंकराचार्य पद को लेकर चल रहे विवाद में राजनीति की एंट्री भी हो चुकी है. समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि “क्षमा वीरस्य भूषणम्” और कहा कि शंकराचार्य से प्रमाणपत्र मांगने वाले पहले अपना प्रमाणपत्र दें. अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि जगद्गुरु का स्थान विश्वगुरु से भी ऊंचा है. उन्होंने भाजपा पर विभाजनकारी सोच का आरोप लगाते हुए कहा कि धार्मिक पदों का राजनीतिकरण नहीं होना चाहिए. उनके बयान के बाद यह विवाद धार्मिक और कानूनी दायरे से निकलकर पूरी तरह राजनीतिक बहस का रूप ले चुका है.

संत समाज की प्रतिक्रिया और मतभेद

इस पूरे घटनाक्रम पर संत समाज की प्रतिक्रियाएं भी एक जैसी नहीं हैं. जगद्गुरु स्वामी रामभद्राचार्य ने माघ मेले में हुए घटनाक्रम को लेकर सरकार की कार्रवाई को सही ठहराया है. उन्होंने कहा कि पालकी से स्नान करना उचित नहीं था और पुलिस द्वारा रोके जाने पर मान जाना चाहिए था. उनका यह भी कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने अभी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को औपचारिक रूप से शंकराचार्य घोषित नहीं किया है. दूसरी ओर, कई साधु-संत प्रशासनिक कार्रवाई से नाराज हैं और इसे सनातन परंपरा में हस्तक्षेप बता रहे हैं. इस तरह संत समाज के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं.

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