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Home»राजनीति»TMC में 'ऑपरेशन उद्धव'? विधायक उधर, विधानसभा उधर... तो फिर असली TMC किसकी, अब ममता के सामने 3 रास्ते
राजनीति

TMC में 'ऑपरेशन उद्धव'? विधायक उधर, विधानसभा उधर... तो फिर असली TMC किसकी, अब ममता के सामने 3 रास्ते

“पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐसा संकट शायद ही कभी देखने को मिला हो. तृणमूल कांग्रेस की स्थापना के बाद पहली बार पार्टी के भीतर इतनी बड़ी बगावत सामने आई है, जिसने सीधे ममता बनर्जी के नेतृत्व और राजनीतिक नियंत्रण पर सवाल खड़े कर दिए हैं.”

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Satya MishraEditorial Desk
Published Jun 4, 2026 · 8:11 AM· 4 min read
TMC में 'ऑपरेशन उद्धव'? विधायक उधर, विधानसभा उधर... तो फिर असली TMC किसकी, अब ममता के सामने 3 रास्ते
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West Bengal: पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐसा संकट शायद ही कभी देखने को मिला हो. तृणमूल कांग्रेस की स्थापना के बाद पहली बार पार्टी के भीतर इतनी बड़ी बगावत सामने आई है, जिसने सीधे ममता बनर्जी के नेतृत्व और राजनीतिक नियंत्रण पर सवाल खड़े कर दिए हैं. 58 विधायकों ने बागी तेवर अपनाते हुए ऋतब्रत बनर्जी को विधानसभा में विपक्ष का नेता चुन लिया और विधानसभा अध्यक्ष ने भी उसे मान्यता दे दी. यह सिर्फ एक संगठनात्मक विवाद नहीं, बल्कि पार्टी के भविष्य, नेतृत्व और चुनाव चिह्न तक की लड़ाई में बदलता दिखाई दे रहा है. सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब बड़ी संख्या में विधायक एक तरफ खड़े हों और विधानसभा में भी उसी गुट को मान्यता मिल जाए, तो फिर असली तृणमूल कांग्रेस किसकी मानी जाएगी? यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में अब इस संकट की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी में हुई टूट से की जाने लगी है.

क्या ममता के हाथ से निकल रही है पार्टी की कमान?

यह भी पढ़ें:बिहार विधान परिषद चुनाव: RJD की लिस्ट जारी होते ही बढ़ी हलचल, रोहिणी आचार्य ने जताई नाराजगी

इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश यही है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर शक्ति संतुलन बदलता दिखाई दे रहा है. अब तक पार्टी में अंतिम फैसला ममता बनर्जी का माना जाता था, लेकिन पहली बार ऐसा हुआ है जब उनके विरोध के बावजूद विधानसभा में एक अलग नेतृत्व को मान्यता मिल गई. इससे यह धारणा मजबूत हुई है कि पार्टी के भीतर असंतोष अब बंद कमरों से निकलकर खुले राजनीतिक संघर्ष में बदल चुका है.

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क्या बंगाल में शुरू हो गया 'ऑपरेशन उद्धव'?

महाराष्ट्र में शिवसेना के साथ जो हुआ था, उसकी यादें इस घटनाक्रम के साथ जोड़ी जा रही हैं. वहां भी शुरुआत विधायकों की बगावत से हुई थी, फिर संगठन और चुनाव चिह्न पर दावा ठोका गया था. बंगाल में भी हालात कुछ वैसी ही दिशा में बढ़ते दिख रहे हैं. हालांकि एक बड़ा अंतर यह है कि बागी गुट अब भी ममता बनर्जी को सम्मान देने की बात कर रहा है, लेकिन पार्टी के संचालन और भविष्य की दिशा को लेकर अलग रुख अपना चुका है. इसलिए राजनीतिक विश्लेषक इसे बंगाल का संभावित 'ऑपरेशन उद्धव' मानकर देख रहे हैं.

क्या अभिषेक बनर्जी बने संकट की असली वजह?

यह भी पढ़ें:हरीश रावत का कांग्रेस के पदों से इस्तीफा, PA पर ED की कार्रवाई के बाद बोले- पार्टी के संघर्ष में कमजोरी नहीं चाहता

बागी खेमे के संकेतों से यह साफ है कि विवाद सिर्फ नेतृत्व का नहीं, बल्कि उत्तराधिकार की राजनीति का भी है. लंबे समय से पार्टी के भीतर यह चर्चा रही है कि अभिषेक बनर्जी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है. कई वरिष्ठ नेताओं को लगता रहा कि संगठन में उनकी भूमिका कमजोर हुई है. अब वही नाराजगी खुलकर सामने आती दिख रही है. यही वजह है कि बागी नेताओं की नाराजगी का केंद्र सीधे ममता नहीं, बल्कि अभिषेक की बढ़ती राजनीतिक भूमिका को माना जा रहा है.

ममता के सामने पहला रास्ता- कानूनी लड़ाई

ममता बनर्जी के पास पहला विकल्प अदालत का दरवाजा खटखटाने का है. विधानसभा अध्यक्ष द्वारा विपक्ष के नेता को दी गई मान्यता को कानूनी चुनौती दी जा सकती है. हालांकि संसदीय मामलों में अदालतें सीमित दखल देती हैं, इसलिए यह लड़ाई लंबी और जटिल हो सकती है. फिर भी ममता खेमा इस रास्ते के जरिए राजनीतिक और कानूनी दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है.

दूसरा और तीसरा रास्ता... निष्कासन या समझौता?

ममता के सामने दूसरा विकल्प बागी विधायकों को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने का है. लेकिन यह कदम उल्टा भी पड़ सकता है, क्योंकि बड़ी संख्या में विधायक अलग होने पर वे खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताकर चुनाव आयोग में दावा ठोक सकते हैं. तीसरा रास्ता बातचीत और समझौते का है, लेकिन फिलहाल यही सबसे कठिन विकल्प दिखाई देता है. क्योंकि बागी खेमे और अभिषेक बनर्जी के बीच बढ़ी दूरी किसी भी समझौते की राह में सबसे बड़ी बाधा बन सकती है. फिलहाल इतना तय है कि यह संकट सिर्फ विधायकों की बगावत नहीं है. यह तृणमूल कांग्रेस के भविष्य, नेतृत्व और राजनीतिक विरासत की लड़ाई है. आने वाले दिनों में ममता बनर्जी जो फैसला लेंगी, वही तय करेगा कि पार्टी पहले की तरह एकजुट रहती है या फिर बंगाल की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत होती है.

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